
बूंद-बूंद से बनता सागर
रुपये-रुपये से बनता घर
रोज़ टिप-टिप गिरती बूंदें, बहती महासागर में
रोज़-रोज़ बीज बोते, बनते बड़े पेड़
एक रुपया ज्यादा नहीं लगता
मटके भर रुपये, हज़ार बीज देते
रोज़ बचाओ पेड़, एक दिन बनेगा पहाड़
पहाड़ों पहाड़ बनाओ, चढ़ो चोटी पे
एक सिक्के की कीमत, ज्यादा नहीं लगती
सुनो मटके में गिरते हुए, वो है पहाड़ की गूंज
टिप-टिप गिरता पानी, सिप-सिप गिरता सिक्का
भविष्य बुला रहा है, उस टिप और सिप से
एक साधारण मटका, उठाता इतना भारी बोझ
हमारे ख्वाबों का वज़न, आसानी से धर लेता है
बूंद-बूंद देता पानी
पियो मुट्ठी भर कहानी
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